धर्माधर्मैश्च संबन्धस्तथा तच्छिवसंस्थितेः ।
तत्फलाफलयोगेन युक्तता तस्य तत्स्थितेः ॥७९॥
dharmādharmaiśca saṃbandhastathā tacchivasaṃsthiteḥ |
tatphalāphalayogena yuktatā tasya tatsthiteḥ
धर्म-अधर्मों के साथ सम्बन्ध भी उसी (शिव) के उन रूपों में संस्थित होने के कारण (बनता है); और उनके फल-अफल के योग से उसकी (भोक्तृत्व की) युक्तता उसके उस रूप में स्थित होने से (सिद्ध होती है)।