The Vision of Śiva· 3.8 / 99

The Vision of Śiva3.8

3.8
यद्यौष्ण्याव्यतिरेकत्वे दृष्टान्तो दाहकाश्रयात् ॥८॥
yadyauṣṇyāvyatirekatve dṛṣṭānto dāhakāśrayāt
— यदि ; — औष्ण्य के अव्यतिरेक होने पर ; — दृष्टान्त (हमारे पक्ष में) ; — आश्रय के दाहक होने से

(हम उत्तर देते हैं:) यदि औष्ण्य (अग्नि से) अव्यतिरिक्त है, तो दृष्टान्त (हमारे ही पक्ष का समर्थन करता है) — क्योंकि उसके आश्रय के दाहक होने से (अग्नि अग्नि ही रहती है; वैसे ही शिव कभी अपनी अव्यतिरिक्त शक्ति को नहीं खोता)।