The Vision of Śiva· 3.7 / 99

The Vision of Śiva3.7

3.7
मन्त्रस्तम्भनतायां हि नासौ वह्निस्तदोच्यते ॥७॥
mantrastambhanatāyāṃ hi nāsau vahnistadocyate
— मन्त्र से स्तम्भित होने की अवस्था में ; — निश्चय ही ; — वह नहीं ; — अग्नि ; — तब ; — कही जाती है

(दृष्टान्त द्वारा आक्षेप:) क्योंकि मन्त्र से स्तम्भित होने की अवस्था में वह (अग्नि) 'अग्नि' नहीं कही जाती (— अतः शक्ति-रहित शिव शिव नहीं रहेगा)।