The Vision of Śiva· 3.6 / 99

The Vision of Śiva3.6

3.6
मुञ्चतोऽपि निजां शक्तिं स्वातन्त्र्ये ज्ञानमापतेत् ॥६॥
muñcato'pi nijāṃ śaktiṃ svātantrye jñānamāpatet
— छोड़ते हुए भी ; — अपनी निज ; — शक्ति को ; — स्वातन्त्र्य में ; — ज्ञान ; — बना रहेगा

अपनी निज शक्ति को छोड़ते हुए भी, स्वातन्त्र्य में (उसका) ज्ञान बना ही रहेगा (क्योंकि शक्ति और शक्तिमान् कभी वस्तुतः पृथक् नहीं होते)।