अङ्गाररूपे किं वह्नौ वह्निता न क्रियात्मके ।
ज्वालादिकेऽथ सावस्था न क्रिया ज्ञानरूपिणी ॥५७॥
aṅgārarūpe kiṃ vahnau vahnitā na kriyātmake |
jvālādike'tha sāvasthā na kriyā jñānarūpiṇī
क्या अंगार-रूप अग्नि में वह्निता (अग्नित्व) है, और क्रिया-स्वरूप (ज्वाला आदि में) नहीं? अथवा वह (अंगार) अवस्था ही (पहले से ही) ज्ञान-रूप क्रिया है (न कि निष्क्रिय)।