The Vision of Śiva· 3.57 / 99

The Vision of Śiva3.57

3.57
अङ्गाररूपे किं वह्नौ वह्निता न क्रियात्मके । ज्वालादिकेऽथ सावस्था न क्रिया ज्ञानरूपिणी ॥५७॥
aṅgārarūpe kiṃ vahnau vahnitā na kriyātmake | jvālādike'tha sāvasthā na kriyā jñānarūpiṇī
— अंगार-रूप में ; — क्या ; — अग्नि में ; — वह्निता (अग्नित्व) ; — नहीं ; — क्रिया-स्वरूप होने पर ; — ज्वाला आदि में ; — अथवा ; — वह (अंगार) अवस्था ; — नहीं ; — क्रिया ; — ज्ञान-रूप

क्या अंगार-रूप अग्नि में वह्निता (अग्नित्व) है, और क्रिया-स्वरूप (ज्वाला आदि में) नहीं? अथवा वह (अंगार) अवस्था ही (पहले से ही) ज्ञान-रूप क्रिया है (न कि निष्क्रिय)।