तत्र का शान्तता ब्रूहि शक्तेः किं वस्तुता न ते ।
वस्तुता चेत्तथाभूतशक्तित्रितयसंगमः ॥५६॥
tatra kā śāntatā brūhi śakteḥ kiṃ vastutā na te |
vastutā cettathābhūtaśaktitritayasaṃgamaḥ
(उत्तर:) बताओ, वहाँ (तथाकथित शान्त अवस्था में) कौन-सी (विशेष) शान्तता है? क्या तुम्हारे (मत में) शक्ति की वस्तुता (सत्ता) नहीं? और यदि वस्तुता है, तो (वहाँ भी) वैसे ही शक्ति-त्रय का संगम (है — अतः दोनों अवस्थाएँ स्वरूप में भिन्न नहीं)।