The Vision of Śiva· 3.56 / 99

The Vision of Śiva3.56

3.56
तत्र का शान्तता ब्रूहि शक्तेः किं वस्तुता न ते । वस्तुता चेत्तथाभूतशक्तित्रितयसंगमः ॥५६॥
tatra kā śāntatā brūhi śakteḥ kiṃ vastutā na te | vastutā cettathābhūtaśaktitritayasaṃgamaḥ
— वहाँ ; — कौन-सी ; — शान्तता ; — बताओ ; — शक्ति की ; — क्या नहीं ; — वस्तुता (सत्ता) ; — नहीं ; — तुम्हारे (मत में) ; — वस्तुता ; — यदि ; — वैसे ही शक्ति-त्रय का संगम

(उत्तर:) बताओ, वहाँ (तथाकथित शान्त अवस्था में) कौन-सी (विशेष) शान्तता है? क्या तुम्हारे (मत में) शक्ति की वस्तुता (सत्ता) नहीं? और यदि वस्तुता है, तो (वहाँ भी) वैसे ही शक्ति-त्रय का संगम (है — अतः दोनों अवस्थाएँ स्वरूप में भिन्न नहीं)।