न तथा जडता क्वापि तथाग्रे सुविचारितैः ।
वर्णयिष्याम एवात्र न च सावयवः क्वचित् ॥४१॥
na tathā jaḍatā kvāpi tathāgre suvicāritaiḥ |
varṇayiṣyāma evātra na ca sāvayavaḥ kvacit
— (तो वस्तुतः) वैसी जड़ता कहीं नहीं है; इसे हम आगे सुविचारित (युक्तियों) से वर्णित करेंगे ही; और (शिव) कहीं भी सावयव नहीं है।