स्वेच्छातो भावरूपत्वे पराधीना कुतः स्थितिः ॥४२॥
svecchāto bhāvarūpatve parādhīnā kutaḥ sthitiḥ
जब (शिव) अपनी ही इच्छा से भाव-रूप होता है, तो (उसकी) स्थिति पराधीन कहाँ से (हो सकती है)?
जब (शिव) अपनी ही इच्छा से भाव-रूप होता है, तो (उसकी) स्थिति पराधीन कहाँ से (हो सकती है)?