आप्तानाप्तभाषितत्वे विशेषो नास्ति शब्दगः ।
नित्यत्वे शब्दतत्त्वस्य व्यङ्ग्यत्वं ध्वनिभिर्न च ॥७७॥
āptānāptabhāṣitatve viśeṣo nāsti śabdagaḥ |
nityatve śabdatattvasya vyaṅgyatvaṃ dhvanibhirna ca
यदि (शब्द) नित्य है, तो आप्त या अनाप्त के द्वारा कहे जाने में शब्द-गत कोई विशेष (अन्तर) नहीं रहता; और नित्य होने पर शब्द-तत्त्व ध्वनियों द्वारा व्यंग्य (अभिव्यक्त) नहीं हो सकता।