अत्रैव शब्दनित्यत्ववादिनो रूढतां गताः ।
अनादिनाथ तेनैव शब्दतत्त्वेन तुल्यता ॥७६॥
atraiva śabdanityatvavādino rūḍhatāṃ gatāḥ |
anādinātha tenaiva śabdatattvena tulyatā
यहीं शब्द-नित्यत्व-वादी रूढ़ (दृढ़मूल) हो गए हैं; (वे दावा करते हैं कि) उसी अनादि शब्द-तत्त्व के साथ तुल्यता है (— किन्तु इसका अब खण्डन करते हैं)।