The Vision of Śiva· 2.75 / 90

The Vision of Śiva2.75

2.75
अनन्तेऽवगमः कुत्र तेजस्त्वे शान्तता कथम् । असर्वगप्रमाणं हि मूर्तिर्नो लक्ष्यते चितः ॥७५॥
anante'vagamaḥ kutra tejastve śāntatā katham | asarvagapramāṇaṃ hi mūrtirno lakṣyate citaḥ
— अनन्त में ; — अवगम (बोध) ; — कहाँ ; — तेज-रूप होने पर ; — शान्तता ; — कैसे ; — असर्वग (अव्यापक) परिमाण ; — क्योंकि ; — मूर्ति (आकार) ; — नहीं ; — लक्षित होती ; — चित् की

अनन्त में अवगम (बोध) कहाँ (टिकेगा)? यदि वह तेज-रूप है, तो शान्तता कैसे? क्योंकि असर्वग (अव्यापक) परिमाण तो मूर्ति (आकार) होगा — और चित् में कोई मूर्ति लक्षित नहीं होती।