अनन्तेऽवगमः कुत्र तेजस्त्वे शान्तता कथम् ।
असर्वगप्रमाणं हि मूर्तिर्नो लक्ष्यते चितः ॥७५॥
anante'vagamaḥ kutra tejastve śāntatā katham |
asarvagapramāṇaṃ hi mūrtirno lakṣyate citaḥ
अनन्त में अवगम (बोध) कहाँ (टिकेगा)? यदि वह तेज-रूप है, तो शान्तता कैसे? क्योंकि असर्वग (अव्यापक) परिमाण तो मूर्ति (आकार) होगा — और चित् में कोई मूर्ति लक्षित नहीं होती।