अनन्तस्यानुभूतिः का परिच्छेदं विनात्मनः ॥७४॥
anantasyānubhūtiḥ kā paricchedaṃ vinātmanaḥ
— किन्तु अनन्त आत्मा की परिच्छेद (सीमा) के बिना कौन-सी अनुभूति (हो सकती है, क्योंकि अनुभूति में परिच्छेद उसकी अनन्तता का विरोध करेगा)?
— किन्तु अनन्त आत्मा की परिच्छेद (सीमा) के बिना कौन-सी अनुभूति (हो सकती है, क्योंकि अनुभूति में परिच्छेद उसकी अनन्तता का विरोध करेगा)?