पश्यन्त्याश्चेदविद्यात्वं तद्भोगौन्मुख्ययोगतः ।
मध्यमादेर्जडायाः किं भोगेन शबलात्मना ॥७०॥
paśyantyāścedavidyātvaṃ tadbhogaunmukhyayogataḥ |
madhyamāderjaḍāyāḥ kiṃ bhogena śabalātmanā
यदि पश्यन्ती का अविद्यात्व उस (फल के) भोग के प्रति उन्मुखता के योग से (आता) है — तो जड़ मध्यमा आदि को शबल-स्वरूप भोग से क्या (प्रयोजन)?