अथ स्वानुभवेनैव पश्यन्तीं पश्य युक्तितः ।
एवं तर्ह्यपरस्यासौ पश्यन्ती कर्मतां गता ॥६३॥
atha svānubhavenaiva paśyantīṃ paśya yuktitaḥ |
evaṃ tarhyaparasyāsau paśyantī karmatāṃ gatā
अब यदि (कहो कि) 'अपने ही अनुभव से युक्तिपूर्वक पश्यन्ती को देखो' — तो ऐसा होने पर वह पश्यन्ती किसी अन्य (द्रष्टा) के लिए कर्म (विषय) बन गई (अतः परम विषयी नहीं रही)।