भवद्भिरेव नाप्तस्याननुभूतार्थवक्तृता ॥६२॥
bhavadbhireva nāptasyānanubhūtārthavaktṛtā
तुम्हारे द्वारा ही (यह स्वीकृत है कि) आप्त (विश्वसनीय वक्ता) वह नहीं हो सकता जो अननुभूत (स्वयं अननुभव किए) अर्थ का वक्ता हो।
तुम्हारे द्वारा ही (यह स्वीकृत है कि) आप्त (विश्वसनीय वक्ता) वह नहीं हो सकता जो अननुभूत (स्वयं अननुभव किए) अर्थ का वक्ता हो।