प्रतिदेहं पृथक्किं सा सर्वत्रैक्येन वा स्थिता ।
नानात्वं तत्पृथक्त्वेन तदैक्यात्समशब्दता ॥४३॥
pratidehaṃ pṛthakkiṃ sā sarvatraikyena vā sthitā |
nānātvaṃ tatpṛthaktvena tadaikyātsamaśabdatā
क्या वह प्रत्येक देह में पृथक् है, अथवा सर्वत्र एकत्व से स्थित है? उसके पृथक्त्व से नानात्व (आएगा); और उसके एकत्व से सबमें समान शब्दता (आएगी — जो अनुभव के विरुद्ध है)।