The Vision of Śiva· 2.43 / 90

The Vision of Śiva2.43

2.43
प्रतिदेहं पृथक्किं सा सर्वत्रैक्येन वा स्थिता । नानात्वं तत्पृथक्त्वेन तदैक्यात्समशब्दता ॥४३॥
pratidehaṃ pṛthakkiṃ sā sarvatraikyena vā sthitā | nānātvaṃ tatpṛthaktvena tadaikyātsamaśabdatā
— प्रत्येक देह में ; — पृथक् ; — क्या ; — वह ; — सर्वत्र ; — एकत्व से ; — अथवा ; — स्थित ; — नानात्व ; — उसके पृथक्त्व से ; — उसके एकत्व से ; — समान शब्दता (एकरूपता)

क्या वह प्रत्येक देह में पृथक् है, अथवा सर्वत्र एकत्व से स्थित है? उसके पृथक्त्व से नानात्व (आएगा); और उसके एकत्व से सबमें समान शब्दता (आएगी — जो अनुभव के विरुद्ध है)।