The Vision of Śiva· 2.37 / 90

The Vision of Śiva2.37

2.37
अथ मध्यमया बाह्या भावा ग्राह्या ह्यविद्यया । तस्या एव हि संयोगो बुद्ध्या संकल्पनात्मना ॥३७॥
atha madhyamayā bāhyā bhāvā grāhyā hyavidyayā | tasyā eva hi saṃyogo buddhyā saṃkalpanātmanā
— अब ; — मध्यमा द्वारा ; — बाह्य ; — भाव ; — ग्राह्य ; — निश्चय ही ; — अविद्या से ; — उसी (मध्यमा) का ही ; — निश्चय ही ; — संयोग ; — बुद्धि के साथ ; — संकल्प-स्वरूप

अब यदि (कहो कि) बाह्य भाव मध्यमा द्वारा अविद्या से ग्राह्य हैं — तो उसी (मध्यमा) का ही संकल्प-स्वरूप बुद्धि के साथ संयोग (बनता है, अतः वह शुद्ध परा नहीं हो सकती)।