The Vision of Śiva· 1.33 / 49

The Vision of Śiva1.33

1.33
बिभ्रद्बिभर्ति रूपाणि तावता व्यवहारतः । यावत्स्थूलं जडाभासं संहतं पार्थिवं घनम् ॥३३॥
bibhradbibharti rūpāṇi tāvatā vyavahārataḥ | yāvatsthūlaṃ jaḍābhāsaṃ saṃhataṃ pārthivaṃ ghanam
— धारण करता हुआ ; — धारण करता है ; — रूपों को ; — उतने से, उतनी मात्रा में ; — व्यवहार से ; — जब तक, जहाँ तक ; — स्थूल ; — जड़ाभास (जड़-सा प्रतीत होता) ; — संहत (संघटित) ; — पार्थिव ; — घन (दृढ़)

रूपों को धारण करता हुआ वह उन्हें उतने ही व्यवहार से धारण करता है — जब तक कि स्थूल, जड़ाभास, संहत, पार्थिव और घन (तत्त्व तक नहीं पहुँच जाता)।