The Vision of Śiva· 1.32 / 49

The Vision of Śiva1.32

1.32
आत्मप्रच्छादनक्रीडां कुर्वतो वा कथंचन । मायारूपमितीत्यादि षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपताम् ॥३२॥
ātmapracchādanakrīḍāṃ kurvato vā kathaṃcana | māyārūpamitītyādi ṣaṭtriṃśattattvarūpatām
— आत्म-प्रच्छादन (स्व-आवरण) की क्रीड़ा को ; — करते हुए (शिव) का ; — अथवा ; — किसी प्रकार ; — माया-रूप ; — इस प्रकार, ऐसा ; — इत्यादि ; — छत्तीस तत्त्वों के स्वरूप को

अथवा किसी प्रकार आत्म-प्रच्छादन (स्व-आवरण) की क्रीड़ा करते हुए (वह) माया-रूप इत्यादि — छत्तीस तत्त्वों के स्वरूप (को धारण करता है)।