The Vision of Śiva1.18
गोः स्तनात्पाततः क्षीरे विकारस्तत एव हि ।
न च क्षीरमित्येष व्यपदेशोऽस्ति तत्क्षणम् ॥१८॥
goḥ stanātpātataḥ kṣīre vikārastata eva hi |
na ca kṣīramityeṣa vyapadeśo'sti tatkṣaṇam
— गाय का ; — स्तन से ; — गिरने के कारण ; — दूध में ; — विकार ; — उसी से ; — ही ; — निश्चय ही ; — नहीं ; — और ; — दूध ; — ऐसा ; — यह ; — व्यपदेश (नाम-निर्देश) ; — होता है ; — उसी क्षण गाय के स्तन से गिरने के कारण दूध में विकार उसी (गिरने) से होता है; किन्तु उसी क्षण 'यह दूध है' — ऐसा व्यपदेश (नाम-निर्देश) नहीं होता।