औन्मुख्यस्य य आभोगः स्थूलः सेच्छा व्यवस्थिता ।
नैचान्मुख्यप्रसङ्गेन शिवः स्थूलत्वभाक् क्वचित् ॥१७॥
aunmukhyasya ya ābhogaḥ sthūlaḥ secchā vyavasthitā |
naicānmukhyaprasaṅgena śivaḥ sthūlatvabhāk kvacit
उन्मुखता का जो स्थूल आभोग (परिपूर्ण विस्तार) है, वही 'इच्छा' के रूप में व्यवस्थित है; किन्तु उस उन्मुखता के प्रसंग से शिव कभी भी स्थूलता का भागी नहीं होता।