The Vision of Śiva· 1.17 / 49

The Vision of Śiva1.17

1.17
औन्मुख्यस्य य आभोगः स्थूलः सेच्छा व्यवस्थिता । नैचान्मुख्यप्रसङ्गेन शिवः स्थूलत्वभाक् क्वचित् ॥१७॥
aunmukhyasya ya ābhogaḥ sthūlaḥ secchā vyavasthitā | naicānmukhyaprasaṅgena śivaḥ sthūlatvabhāk kvacit
— उन्मुखता का ; — जो ; — आभोग (परिपूर्ण विस्तार) ; — स्थूल ; — वह ; — इच्छा ; — व्यवस्थित ; — नहीं ; — उन्मुखता के प्रसंग से ; — शिव ; — स्थूलता का भागी ; — कभी

उन्मुखता का जो स्थूल आभोग (परिपूर्ण विस्तार) है, वही 'इच्छा' के रूप में व्यवस्थित है; किन्तु उस उन्मुखता के प्रसंग से शिव कभी भी स्थूलता का भागी नहीं होता।