चिद्वत्तच्छक्तिसङ्कोचान्मलावृतः संसारी ॥९॥
cid-vat tac-chakti-saṅkocān malāvṛtaḥ saṃsārī
sūtra
चित्-स्वरूप होते हुए भी अपनी शक्तियों के संकोच के कारण मलों से आवृत होकर वह संसारी (संसार में भटकने वाला जीव) बन जाता है।
चित्-स्वरूप होते हुए भी अपनी शक्तियों के संकोच के कारण मलों से आवृत होकर वह संसारी (संसार में भटकने वाला जीव) बन जाता है।