Parātrīśikā· 1.35 / 36

Parātrīśikā1.35

1.35
यान् यान् कामयते कामांस् तान् ताञ् च्छीघ्रम् अवाप्नुयात् । अज्ञः प्रत्यक्षताम् एति सर्वज्ञत्वं न संशयः ॥३५॥
yān yān kāmayate kāmāṃs tān tāñ cchīghram avāpnuyāt | ajñaḥ pratyakṣatām eti sarvajñatvaṃ na saṃśayaḥ
— जिन-जिन (कामनाओं) को (वितरणात्मक) ; — इच्छा करता है, चाहता है ; — कामनाएँ — इच्छित विषय ; — उन-उन को (वितरणात्मक) ; — शीघ्र, तुरन्त (शीघ्रम्) ; — प्राप्त कर लेता है ; — अज्ञ — अज्ञानी जन ; — प्रत्यक्षता — साक्षात् बोध की अवस्था ; — प्राप्त होता है, पहुँचता है ; — सर्वज्ञत्व — सर्वज्ञता ; — नहीं ; — संशय — कोई संशय नहीं

जिन-जिन कामनाओं की वह इच्छा करता है, उन-उन को वह शीघ्र प्राप्त कर लेता है; अज्ञ भी प्रत्यक्षता (साक्षात् बोध) को प्राप्त होता है और सर्वज्ञत्व को — इसमें कोई संशय नहीं।