Parātrīśikā· 1.34 / 36

Parātrīśikā1.34

1.34
आद्यन्तरहितम् बीजं विकसत् तिथिमध्यगम् । हृत्पद्मान्तर्गतं ध्यायेत् सोमांशुं नित्यम् अभ्यस्येत् ॥३४॥
ādyantarahitam bījaṃ vikasat tithimadhyagam | hṛtpadmāntargataṃ dhyāyet somāṃśuṃ nityam abhyasyet
— आदि और अन्त से रहित ; — बीज — बीजाक्षर ; — विकसित होते हुए, खिलते हुए ; — तिथियों (स्वरों) के मध्य स्थित ; — हृदय-कमल के भीतर निहित (हृत्-पद्म) ; — ध्यान करे ; — सोम-किरण — चन्द्र-रश्मि (अमृत-धारा) ; — नित्य, निरन्तर ; — अभ्यास करे, साधे

आदि और अन्त से रहित, विकसित होते हुए, तिथियों के मध्य स्थित, हृदय-कमल के भीतर निहित उस बीज का ध्यान करे — उस सोम-किरण (चन्द्र-रश्मि) का — और नित्य अभ्यास करे।