Parātrīśikā· 1.33 / 36

Parātrīśikā1.33

1.33
एवं यजनम् आख्यातम् अग्निकार्ये ऽप्य् अयं विधिः । कृतपूजाविधिः सम्यक् स्मरन् बीजम् प्रसिद्ध्यति ॥३३॥
evaṃ yajanam ākhyātam agnikārye 'py ayaṃ vidhiḥ | kṛtapūjāvidhiḥ samyak smaran bījam prasiddhyati
— इस प्रकार ; — यजन — पूजा ; — कहा गया, घोषित हुआ ; — अग्निकार्य में — होम-कर्म में ; — भी (अपि) ; — यह ; — विधि — प्रक्रिया, नियम ; — पूजा-विधि को सम्पन्न करने वाला ; — भली प्रकार, सम्यक् ; — स्मरण करता हुआ, चिन्तन करता हुआ ; — बीज — बीजाक्षर ; — सिद्धि पाता है, सफल होता है

इस प्रकार यजन कहा गया; अग्निकार्य में भी यही विधि है। पूजा-विधि को भली प्रकार सम्पन्न करके, बीज का सम्यक् स्मरण करता हुआ (साधक) सिद्धि को प्राप्त करता है।