Parātrīśikā· 1.26 / 36

Parātrīśikā1.26

1.26
दीक्षा भवत्य् असंदिग्धा तिलाज्याहुतिवर्जिता । मूर्ध्नि वक्त्रे च हृदये गुह्ये मुर्तौ तथैव च ॥२६॥
dīkṣā bhavaty asaṃdigdhā tilājyāhutivarjitā | mūrdhni vaktre ca hṛdaye guhye murtau tathaiva ca
— दीक्षा — संस्कार, अभिषेक ; — होती है, घटित होती है ; — असंदिग्ध — निःसंदेह ; — तिल और घृत की आहुति से रहित ; — मूर्धा (शिर) पर ; — मुख/वक्त्र पर ; — और ; — हृदय में ; — गुह्य-स्थान में ; — मूर्ति (देह) में (यथा-प्रसारित) ; — इसी प्रकार (तथा + एव) ; — और

और दीक्षा निःसंदेह तिल और घृत की आहुति के बिना भी हो जाती है — मूर्धा (शिर) पर, मुख पर, हृदय में, गुह्य-स्थान में, तथा इसी प्रकार मूर्ति (देह) में।