दीक्षा भवत्य् असंदिग्धा तिलाज्याहुतिवर्जिता ।
मूर्ध्नि वक्त्रे च हृदये गुह्ये मुर्तौ तथैव च ॥२६॥
dīkṣā bhavaty asaṃdigdhā tilājyāhutivarjitā |
mūrdhni vaktre ca hṛdaye guhye murtau tathaiva ca
— दीक्षा — संस्कार, अभिषेक; — होती है, घटित होती है; — असंदिग्ध — निःसंदेह; — तिल और घृत की आहुति से रहित; — मूर्धा (शिर) पर; — मुख/वक्त्र पर; — और; — हृदय में; — गुह्य-स्थान में; — मूर्ति (देह) में (यथा-प्रसारित); — इसी प्रकार (तथा + एव); — और
और दीक्षा निःसंदेह तिल और घृत की आहुति के बिना भी हो जाती है — मूर्धा (शिर) पर, मुख पर, हृदय में, गुह्य-स्थान में, तथा इसी प्रकार मूर्ति (देह) में।