Parātrīśikā· 1.27 / 36

Parātrīśikā1.27

1.27
न्यासं क्र्त्वा शिखां बद्ध्वा सप्तविंसतिमन्त्रिताम् । एकैकेन दिशां बन्धं दशानाम् अपि कारयेत् ॥२७॥
nyāsaṃ krtvā śikhāṃ baddhvā saptaviṃsatimantritām | ekaikena diśāṃ bandhaṃ daśānām api kārayet
— न्यास — देह पर मन्त्रों का विन्यास ; — करके ; — शिखा — चूड़ा (बालों की लट) ; — बाँधकर ; — सत्ताईस बार अभिमन्त्रित (यथा-प्रसारित) ; — प्रत्येक एक (मन्त्र) से, एक-एक करके ; — दिशाओं का ; — बन्ध — दिशाओं का सीलन (आवरण) ; — दसों का ; — भी ; — करना चाहिए, कराना चाहिए

न्यास करके, सत्ताईस बार अभिमन्त्रित शिखा को बाँधकर, प्रत्येक एक (मन्त्र) से दसों दिशाओं का भी बन्ध करना चाहिए।