Parātrīśikā· 1.28 / 36

Parātrīśikā1.28

1.28
तालत्रयम् पुरा दत्त्वा सशब्दं विघ्नशान्तये । शिखासंख्याभिजप्तेन तोयेनाभ्युक्षयेत् ततः ॥२८॥
tālatrayam purā dattvā saśabdaṃ vighnaśāntaye | śikhāsaṃkhyābhijaptena toyenābhyukṣayet tataḥ
— तीन ताल — तीन बार ताली (ताल-त्रय) ; — पहले, प्रथमतः ; — देकर, बजाकर ; — सशब्द — ध्वनि के साथ, ऊँचे स्वर में ; — विघ्नों की शान्ति के लिए ; — शिखा की संख्या जितनी बार अभिमन्त्रित ; — जल से प्रोक्षण (छिड़काव) करना चाहिए (तोय + अभ्युक्षयेत्) ; — तब, तत्पश्चात्

पहले विघ्नों की शान्ति के लिए सशब्द तीन ताल देकर, तत्पश्चात् शिखा की संख्या जितनी बार अभिमन्त्रित जल से प्रोक्षण (छिड़काव) करना चाहिए।