Parātrīśikā· 1.24 / 36

Parātrīśikā1.24

1.24
सर्वगो निर्मलः स्वच्छस् तृप्तः स्वायतनः शुचिः । यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः ॥२४॥
sarvago nirmalaḥ svacchas tṛptaḥ svāyatanaḥ śuciḥ | yathā nyagrodhabījasthaḥ śaktirūpo mahādrumaḥ
— सर्वगत — सर्वव्यापी ; — निर्मल — मलरहित ; — स्वच्छ — पारदर्शी ; — तृप्त — परिपूर्ण ; — स्व-आश्रयी — अपने ही आधार में स्थित ; — शुचि — पवित्र ; — जैसे, जिस प्रकार ; — वट के बीज में स्थित (न्यग्रोध-बीज) ; — शक्ति-रूप में — सम्भावना-रूप में ; — महावृक्ष — विशाल वृक्ष

सर्वगत, निर्मल, स्वच्छ, तृप्त, स्व-आश्रयी और शुचि — जैसे वट के बीज में महावृक्ष शक्ति-रूप (सम्भावना-रूप) में स्थित रहता है,