— उस-उस भिन्न संवित्ति के द्वारों से; — एक प्रमाता में; — प्रतिष्ठित होने पर (वर्तमान कृदन्त); — भावों के (होने पर); — यह ज्ञातृता (ज्ञाता-भाव); — सम्भव होती है (√पद्+उप, आत्मनेपद)
जब उस-उस भिन्न संवित्ति के द्वारों से (अनेक) भाव एक प्रमाता में प्रतिष्ठित होते हैं, तब यह ज्ञातृत्व (ज्ञाता-भाव) सम्भव होता है।