Verses on the Recognition of the Lord· 7.2 / 14

Verses on the Recognition of the Lord7.2

7.2
तत्तद्विभिन्नसंवित्तिमुखैर् एकप्रमातरि प्रतितिष्ठत्सु भावेषु ज्ञातेयम् उपपद्यते ॥२॥
tattadvibhinnasaṃvittimukhair ekapramātari pratitiṣṭhatsu bhāveṣu jñāteyam upapadyate
— उस-उस भिन्न संवित्ति के द्वारों से ; — एक प्रमाता में ; — प्रतिष्ठित होने पर (वर्तमान कृदन्त) ; — भावों के (होने पर) ; — यह ज्ञातृता (ज्ञाता-भाव) ; — सम्भव होती है (√पद्+उप, आत्मनेपद)

जब उस-उस भिन्न संवित्ति के द्वारों से (अनेक) भाव एक प्रमाता में प्रतिष्ठित होते हैं, तब यह ज्ञातृत्व (ज्ञाता-भाव) सम्भव होता है।