dṛksvābhāsaiva nānyena vedyā rūpadṛśeva dṛk
rase saṃskārajatvaṃ tu tattulyatvaṃ na tadgatiḥ
— दृक् — ज्ञान (देखने की क्रिया); — स्वप्रकाश ही, स्व-आभास ही; — अन्य के द्वारा नहीं; — वेद्य, ज्ञेय; — जैसे रूप का दर्शन (अन्य दर्शन से ज्ञेय नहीं); — दृक् — ज्ञान; — रस के (स्मरण) में; — संस्कार से उत्पन्न होना; — किन्तु, केवल; — उसके (मूल के) सदृश होना; — नहीं; — उसका (मूल का) ज्ञान
दृक् (ज्ञान) स्वप्रकाश ही है, अन्य के द्वारा ज्ञेय नहीं — जैसे रूप का एक दर्शन दूसरे दर्शन से (नहीं जाना जाता)। रस (के स्मरण) में संस्कार से उत्पन्न होने का अर्थ केवल उसके सदृश होना है, उसका (मूल का) ज्ञान नहीं।