Verses on the Recognition of the Lord· 3.1 / 7

Verses on the Recognition of the Lord3.1

3.1
सत्यं किं तु स्मृतिज्ञानं पूर्वानुभवसंस्कृतेः जातम् अप्य् आत्मनिष्ठं तन् नाद्यानुभववेदकम् ॥१॥
satyaṃ kiṃ tu smṛtijñānaṃ pūrvānubhavasaṃskṛteḥ jātam apy ātmaniṣṭhaṃ tan nādyānubhavavedakam
— सत्य (है), स्वीकृत ; — किन्तु, फिर भी ; — स्मृति-रूप ज्ञान ; — पूर्व अनुभव के संस्कार से ; — उत्पन्न (√जन्) ; — यद्यपि ; — (ज्ञाता) आत्मा में निष्ठ ; — वह (स्मृति-ज्ञान) ; — नहीं ; — मूल अनुभव को प्रकट करने वाला

(उत्तर:) सत्य है; किन्तु स्मृति-रूप ज्ञान, यद्यपि पूर्व अनुभव के संस्कार से उत्पन्न होता है और (ज्ञाता) आत्मा में स्थित रहता है, तथापि वह उस मूल अनुभव को (स्वयं) प्रकट नहीं करता।