Verses on the Recognition of the Lord· 2.11 / 11

Verses on the Recognition of the Lord2.11

2.11
द्विष्ठस्यानेकरूपत्वात् सिद्धस्यान्यानपेक्षणात् पारतन्त्र्याद्ययोगाच् च तेन कर्तापि कल्पितः ॥११॥
dviṣṭhasyānekarūpatvāt siddhasyānyānapekṣaṇāt pāratantryādyayogāc ca tena kartāpi kalpitaḥ
— दो में (कार्य-कारण में) रहने वाले का ; — अनेक रूप होने के कारण ; — सिद्ध (वस्तु) का ; — अन्य की अपेक्षा न होने के कारण ; — परतन्त्रता आदि के योग न होने के कारण ; — और ; — इसलिए ; — कर्ता ; — भी ; — कल्पित, कल्पना-मात्र

(विरोधी निष्कर्ष करता है:) क्योंकि दो में (कार्य-कारण में) रहने वाले का अनेक रूप होता है, क्योंकि सिद्ध वस्तु अन्य की अपेक्षा नहीं रखती, और क्योंकि परतन्त्रता आदि का योग नहीं बनता — इसलिए 'कर्ता' भी केवल कल्पित ही है।