Verses on the Recognition of the Lord· 15.12 / 18

Verses on the Recognition of the Lord15.12

15.12
सर्वो ममायं विभव इत्येवं परिजानतः विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरे ऽपि महेशता ॥१२॥
sarvo mamāyaṃ vibhava ityevaṃ parijānataḥ viśvātmano vikalpānāṃ prasare 'pi maheśatā
— यह समस्त, सब कुछ ; — मेरा ; — यह ; — विभव — विस्तार, ऐश्वर्य ; — इति एवम् — इस प्रकार ; — पूर्ण रूप से पहचानने वाले के (वर्तमान कृदन्त) ; — विश्व-स्वरूप के (जिसका आत्मा विश्व है) ; — विकल्पों के ; — प्रसार (फैलाव) में ; — भी ; — महेशता — महान् ईश्वर होने का भाव

'यह समस्त विभव (विस्तार) मेरा है' इस प्रकार पूर्ण रूप से पहचानने वाले, विश्व-स्वरूप (पुरुष) के लिए, विकल्पों के प्रसार में भी महेशता (महान् ईश्वर होने का भाव) रहती है।