Verses on the Recognition of the Lord· 14.18 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.18

14.18
हेया त्रयीयं प्राणादेः प्राधान्यात् कर्तृतागुणे तद्धानोपचयप्रायसुखदुःखादियोगतः ॥१८॥
heyā trayīyaṃ prāṇādeḥ prādhānyāt kartṛtāguṇe taddhānopacayaprāyasukhaduḥkhādiyogataḥ
— हेय — त्याज्य (विधिवत् कृदन्त) ; — त्रयी (तीन अवस्थाएँ) ; — यह ; — प्राण आदि की ; — प्रधानता के कारण ; — कर्तृता के गौण होने पर ; — उस (प्राण) की हानि-उपचय (घटने-बढ़ने) से प्रायः उत्पन्न सुख-दुःख आदि के योग के कारण

यह त्रयी (तीन अवस्थाएँ) हेय (त्याज्य) हैं, क्योंकि कर्तृता के गौण होने पर प्राण आदि की प्रधानता रहती है — उस (प्राण) की हानि और उपचय (घटने-बढ़ने) से प्रायः उत्पन्न होने वाले सुख-दुःख आदि के योग के कारण।