Verses on the Recognition of the Lord· 14.19 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.19

14.19
प्राणापानमयः प्राणः प्रत्येकं सुप्तजाग्रतोः तच्छेदात्मा समानाख्यः सौषुप्ते विषुवत्स्व् इव ॥१९॥
prāṇāpānamayaḥ prāṇaḥ pratyekaṃ suptajāgratoḥ tacchedātmā samānākhyaḥ sauṣupte viṣuvatsv iva
— प्राण और अपान-मय ; — प्राण (वायु) ; — क्रमशः ; — सुप्त और जाग्रत् में (द्विवचन) ; — उन दोनों के छेद (सन्धि) स्वरूप ; — समान नामक ; — सुषुप्ति में ; — विषुवत् (दिन-रात समानता) में (सूर्य) के समान

प्राण और अपान-मय प्राण क्रमशः जाग्रत् और सुप्त में (कार्य करता है); उन दोनों के छेद (सन्धि) स्वरूप समान नामक (प्राण) सुषुप्ति में (कार्य करता है), जैसे विषुवत् (दिन-रात समानता) में (सूर्य)।