Verses on the Recognition of the Lord· 14.17 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.17

14.17
सर्वाक्षगोचरत्वेन या तु बाह्यतया स्थिरा सृष्टिः साधारणी सर्वप्रमातॄणां स जागरः ॥१७॥
sarvākṣagocaratvena yā tu bāhyatayā sthirā sṛṣṭiḥ sādhāraṇī sarvapramātṝṇāṃ sa jāgaraḥ
— समस्त इन्द्रियों का विषय होने के कारण ; — जो ; — किन्तु ; — बाह्यता के कारण ; — स्थिर, टिकी रहने वाली ; — सृष्टि ; — साधारण, साझी ; — समस्त प्रमाताओं के लिए ; — वह ; — जागरण (जाग्रत् अवस्था)

किन्तु जो सृष्टि समस्त इन्द्रियों का विषय होने के कारण, बाह्यता से स्थिर है, और समस्त प्रमाताओं में साधारण (साझी) है, वह जागरण (जाग्रत् अवस्था) है।