Verses on the Recognition of the Lord· 14.16 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.16

14.16
मनोमात्रपथे ऽप्य् अक्षविषयत्वेन विभ्रमात् स्पष्टावभासा भावानां सृष्टिः स्वप्नपदं मतम् ॥१६॥
manomātrapathe 'py akṣaviṣayatvena vibhramāt spaṣṭāvabhāsā bhāvānāṃ sṛṣṭiḥ svapnapadaṃ matam
— मन-मात्र के पथ पर ; — भी ; — इन्द्रिय-विषयत्व रूप में (मानने से) ; — विभ्रम (भ्रम) के कारण ; — स्पष्ट आभास वाली ; — भावों की ; — सृष्टि ; — स्वप्न-पद (स्वप्न अवस्था) ; — मानी गई (भूत कृदन्त)

मन-मात्र के पथ पर भी, इन्द्रिय-विषयत्व रूप विभ्रम (भ्रम) के कारण, भावों की स्पष्ट आभास वाली जो सृष्टि (होती है), वह स्वप्न-पद (स्वप्न अवस्था) मानी गई है।