Verses on the Recognition of the Lord· 14.15 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.15

14.15
तावन् मात्रस्थितौ प्रोक्तं सौषुप्त[ं] प्रलयोपमम् सवेद्यम् अपवेद्यं च मायामलयुतायुतम् ॥१५॥
tāvan mātrasthitau proktaṃ sauṣupta[ṃ] pralayopamam savedyam apavedyaṃ ca māyāmalayutāyutam
— इतनी मात्र ; — (शुद्ध प्रमाता रूप) मात्र की स्थिति में ; — कहा गया (भूत कृदन्त) ; — सुषुप्ति (सौषुप्त अवस्था) ; — प्रलय के समान ; — सवेद्य — विषय-सहित ; — अपवेद्य — विषय-रहित ; — और ; — माया-मल से युक्त या अयुक्त

इतनी मात्र (शुद्ध प्रमाता) की स्थिति को प्रलय के समान सुषुप्ति कहा गया है — चाहे सवेद्य (विषय-सहित) हो या अपवेद्य (विषय-रहित), चाहे माया-मल से युक्त हो या अयुक्त।