Verses on the Recognition of the Lord· 13.5 / 11

Verses on the Recognition of the Lord13.5

13.5
अत्रापरत्वम् भावानाम् अनात्मत्वेन भासनात् परताहन्तयाच्छादात् परापरदशा हि सा ॥५॥
atrāparatvam bhāvānām anātmatvena bhāsanāt paratāhantayācchādāt parāparadaśā hi sā
— यहाँ (इस स्तर पर) ; — अपरत्व — निम्न स्थिति ; — भावों का ; — अनात्म रूप में ; — (उनके) प्रतिभासित होने के कारण ; — परता — उच्च स्थिति ; — (उनकी) अहन्ता से ; — (उससे) आच्छादित होने के कारण ; — परापर (उच्च-नीच) दशा ; — निश्चय ही ; — वह (सद्विद्या)

यहाँ भावों का अपरत्व (निम्न स्थिति) इसलिए है क्योंकि वे अनात्म रूप में प्रतिभासित होते हैं; और परत्व (उच्च स्थिति) इसलिए है क्योंकि (वह) उनकी अहन्ता से आच्छादित है; इस प्रकार वह (सद्विद्या) परापर (उच्च-नीच) दशा ही है।