Verses on the Recognition of the Lord· 12.11 / 21

Verses on the Recognition of the Lord12.11

12.11
योगिनिर्माणताभावे प्रमाणान्तरनिश्चिते कार्यं हेतुः स्वभावो वात एवोत्पत्तिमूलजः ॥११॥
yoginirmāṇatābhāve pramāṇāntaraniścite kāryaṃ hetuḥ svabhāvo vā-ta evotpattimūlajaḥ
— योगी के निर्माण के विद्यमान होने पर ; — अन्य प्रमाण से निश्चित (भूत कृदन्त) ; — कार्य ; — हेतु, कारण ; — (उनका) स्वभाव ; — अथवा ; — इसी कारण ; — उत्पत्ति के मूल (इच्छा) से उत्पन्न

जब योगी का निर्माण विद्यमान हो, और अन्य प्रमाण से निश्चित हो, तब कार्य, हेतु अथवा (उनका) स्वभाव — इसी कारण सब उत्पत्ति के मूल (इच्छा) से ही उत्पन्न होते हैं।