Verses on the Recognition of the Lord· 11.3 / 17

Verses on the Recognition of the Lord11.3

11.3
यथारुचि यथार्थित्वं यथाव्युत्पत्ति भिद्यते आभासो ऽप्य् अर्थ एकस्मिन्न् अनुसंधानसाधिते ॥३॥
yathāruci yathārthitvaṃ yathāvyutpatti bhidyate ābhāso 'py artha ekasminn anusaṃdhānasādhite
— रुचि के अनुसार ; — आवश्यकता के अनुसार ; — व्युत्पत्ति (ज्ञान) के अनुसार ; — भिन्न होता है (कर्मवाच्य, √भिद्) ; — आभास ; — भी ; — (एक) अर्थ में ; — एक ही (अर्थ में) ; — अनुसन्धान से सिद्ध (भूत कृदन्त)

रुचि के अनुसार, आवश्यकता के अनुसार, और व्युत्पत्ति (ज्ञान) के अनुसार आभास भिन्न होता है — एक ही अर्थ में भी, जो अनुसन्धान से सिद्ध है।