Verses on the Recognition of the Lord· 11.4 / 17

Verses on the Recognition of the Lord11.4

11.4
दीर्घवृत्तोर्ध्वपुरुषधूमचान्दनतादिभिः यथाभासा विभिद्यन्ते देशकालाविभेदिनः ॥४॥
dīrghavṛttordhvapuruṣadhūmacāndanatādibhiḥ yathābhāsā vibhidyante deśakālāvibhedinaḥ
— दीर्घ, वृत्त (गोल), ऊर्ध्व, पुरुष, धूम, चान्दनता आदि (विशेषणों) से ; — आभासों के अनुरूप ; — भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं (कर्मवाच्य, √भिद्+वि) ; — (स्वयं में) देश-काल से अभिन्न

दीर्घ, वृत्त (गोल), ऊर्ध्व (खड़ा), पुरुष, धूम, चान्दनता (चन्दन-पन) आदि (विशेषणों) के द्वारा आभासों के अनुरूप ही (वस्तुएँ) भिन्न-भिन्न प्रतीत होती हैं, यद्यपि (स्वयं में) देश-काल से अभिन्न हैं।