Verses on the Recognition of the Lord· 11.17 / 17

Verses on the Recognition of the Lord11.17

11.17
अप्रवर्तितपूर्वो ऽत्र केवलं मूढतावशात् शक्तिप्रकाशेनेशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ॥१७॥
apravartitapūrvo 'tra kevalaṃ mūḍhatāvaśāt śaktiprakāśeneśādivyavahāraḥ pravartyate
— जो पहले कभी प्रवृत्त नहीं किया गया (भूत कृदन्त) ; — यहाँ, इस विषय में ; — केवल, मात्र ; — मूढ़ता के वश से ; — शक्ति के प्रकाश से ; — 'ईश' आदि (रूप में पहचानने) का व्यवहार ; — प्रवर्तित किया जाता है (प्रेरणार्थक कर्मवाच्य, √वृत्+प्र)

यहाँ केवल मूढ़ता के वश से जो पहले कभी प्रवृत्त नहीं किया गया था — अर्थात् (उसे) 'ईश' आदि (रूप में पहचानने) का व्यवहार — वह अब (उसकी) शक्ति के प्रकाश से प्रवर्तित किया जाता है।