Verses on the Recognition of the Lord· 11.10 / 17

Verses on the Recognition of the Lord11.10

11.10
दूरान्तिकतयार्थानां परोक्षाध्यक्षतात्मना बाह्यान्तरतया दोषैर् व्यञ्जकस्यान्यथापि वा ॥१०॥
dūrāntikatayārthānāṃ parokṣādhyakṣatātmanā bāhyāntaratayā doṣair vyañjakasyānyathāpi vā
— दूर या निकट होने से ; — अर्थों के ; — परोक्ष या प्रत्यक्ष होने के रूप में ; — बाह्य या आन्तरिक होने से ; — दोषों से (प्रमाता के) ; — व्यञ्जक (प्रकाशक) के ; — अन्यथा ; — अथवा और भी

अर्थों के (आभास भिन्न होते हैं) — उनके दूर या निकट होने से, परोक्ष या प्रत्यक्ष होने से, बाह्य या आन्तरिक होने से, अथवा व्यञ्जक (प्रकाशक) के दोषों से और अन्य प्रकार से भी।