Verses on the Recognition of the Lord· 10.4 / 7

Verses on the Recognition of the Lord10.4

10.4
स्वात्मनिष्ठा विविक्ताभा भावा एकप्रमातरि अन्योन्यान्वयरूपैक्ययुजः संबन्धधीपदम् ॥४॥
svātmaniṣṭhā viviktābhā bhāvā ekapramātari anyonyānvayarūpaikyayujaḥ saṃbandhadhīpadam
— अपने-अपने स्वरूप में निष्ठ ; — विविक्त (पृथक्) प्रतीत होने वाले ; — भाव ; — एक प्रमाता में ; — परस्पर अन्वय रूप एकता से युक्त ; — सम्बन्ध-ज्ञान का पद (आधार)

अपने-अपने स्वरूप में निष्ठ तथा विविक्त (पृथक्) प्रतीत होने वाले भाव, एक प्रमाता में परस्पर अन्वय रूप एकता से युक्त होकर, सम्बन्ध-ज्ञान का पद (आधार) बनते हैं।