Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 8.12 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)8.12

8.12
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ ८-१२ ॥
sarvadvārāṇi saṃyamya mano hṛdi nirudhya ca | mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇamāsthito yogadhāraṇām || 8-12 ||
— समस्त द्वारों को संयत करके ; — और मन को हृदय में निरुद्ध करके ; — अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके ; — योग की धारणा में स्थित होकर

समस्त (शरीर के) द्वारों को संयत करके, मन को हृदय में निरुद्ध करके, अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके, योग की धारणा में स्थित होकर,