तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदैहिकम् ।
ततोभूयोऽपि यतते संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥
६-४५ ॥
tatra taṃ buddhisaṃyogaṃ labhate paurvadaihikam |
tatobhūyo'pi yatate saṃsiddhau kurunandana ||
6-45 ||
हे कुरुनन्दन, वहाँ वह पूर्व-देह में अर्जित बुद्धि के संयोग को पुनः प्राप्त करता है, और फिर वहाँ से संसिद्धि के लिए अधिक यत्न करता है।