Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.45 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.45

6.45
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदैहिकम् । ततोभूयोऽपि यतते संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ६-४५ ॥
tatra taṃ buddhisaṃyogaṃ labhate paurvadaihikam | tatobhūyo'pi yatate saṃsiddhau kurunandana || 6-45 ||
— वहाँ वह उस बुद्धि-संयोग को ; — पूर्व-देह में अर्जित को पाता है ; — और फिर वहाँ से अधिक यत्न करता है ; — संसिद्धि के लिए, हे कुरुनन्दन

हे कुरुनन्दन, वहाँ वह पूर्व-देह में अर्जित बुद्धि के संयोग को पुनः प्राप्त करता है, और फिर वहाँ से संसिद्धि के लिए अधिक यत्न करता है।