पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सन् ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥
६-४६ ॥
pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśo'pi san |
jijñāsurapi yogasya śabdabrahmātivartate ||
6-46 ||
उसी पूर्व-अभ्यास से वह विवश होकर भी (योग की ओर) खिंच जाता है; और योग का जिज्ञासु भी शब्दब्रह्म (वेद के कर्मकाण्ड) का अतिक्रमण कर जाता है।