Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.46 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.46

6.46
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सन् । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ६-४६ ॥
pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśo'pi san | jijñāsurapi yogasya śabdabrahmātivartate || 6-46 ||
— उसी पूर्व-अभ्यास से ; — वह विवश होकर भी खिंच जाता है ; — योग का जिज्ञासु भी ; — शब्दब्रह्म का अतिक्रमण कर जाता है

उसी पूर्व-अभ्यास से वह विवश होकर भी (योग की ओर) खिंच जाता है; और योग का जिज्ञासु भी शब्दब्रह्म (वेद के कर्मकाण्ड) का अतिक्रमण कर जाता है।