Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.33 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.33

6.33
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ६-३३ ॥
ātmaupamyena sarvatra samaṃ paśyati yo'rjuna | sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ sa yogī paramo mataḥ || 6-33 ||
— आत्मा की उपमा से सर्वत्र ; — समान देखता है जो, हे अर्जुन ; — सुख हो अथवा दुःख ; — वह योगी परम (श्रेष्ठ) माना गया

हे अर्जुन, जो आत्मा की उपमा से सर्वत्र सुख हो या दुःख — सबको समान देखता है, वह योगी परम (श्रेष्ठ) माना गया है।