आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
६-३३ ॥
ātmaupamyena sarvatra samaṃ paśyati yo'rjuna |
sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ sa yogī paramo mataḥ ||
6-33 ||
हे अर्जुन, जो आत्मा की उपमा से सर्वत्र सुख हो या दुःख — सबको समान देखता है, वह योगी परम (श्रेष्ठ) माना गया है।